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अन्त में खामोशी को गले लगाकर 'उपदेश'।

                
                                                         
                            मोहब्बत मर्यादा में रहकर छटपटाती रही।
                                                                 
                            
रह रहकर वह जज्बाती दबाव बनाती रही।।

अपना रंग तक न चढा सकीं पति के ऊपर।
ज़माने के सामने बेबस रहकर इतराती रही।।

पति से इश्क करने की सजा पाती जब पत्नी।
शोर दबाने के हथकंडे बखूबी अपनाती रही।।

परिवार न बिखर जाए कहीं अपने तरफ से।
हर सम्भव प्रयास करके आँसू बहाती रही।।

अन्त में खामोशी को गले लगाकर 'उपदेश'।
क्षणिकाएं लिख कर जिन्दगी बिताती रही।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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2 सप्ताह पहले

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