अपने सपनों में एक नई उड़ान भरते ही।
बेचारी आँख खुल गई खाई के उभरते ही।।
शिक्षा पर था भरोसा पहचान दिलवायेगी।
सरकार पलटने लगी नौकरी उद्गार करते ही।।
हुनर और मेहनत से मिसाल कायम न हुई।
कई कमियाँ उभर आई नींद कुर्बान करते ही।।
वक्त बदला रिश्ता भी मिला ख्वाहिशें टूटी।
रोज़मर्रा के काम में व्यस्त रस्मे पूरी करते ही।।
शिकायत किससे करे असहाय सी 'उपदेश'।
घर की चारदीवारी में खुद को बंद करते ही।।
शिक्षित नारी की व्यथा नारों में दबती जा रही।
हताश होती रही नारी उत्थान की बाते करते ही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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