आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अपने सपनों में एक नई उड़ान भरते ही।

                
                                                         
                            अपने सपनों में एक नई उड़ान भरते ही।
                                                                 
                            
बेचारी आँख खुल गई खाई के उभरते ही।।

शिक्षा पर था भरोसा पहचान दिलवायेगी।
सरकार पलटने लगी नौकरी उद्गार करते ही।।

हुनर और मेहनत से मिसाल कायम न हुई।
कई कमियाँ उभर आई नींद कुर्बान करते ही।।

वक्त बदला रिश्ता भी मिला ख्वाहिशें टूटी।
रोज़मर्रा के काम में व्यस्त रस्मे पूरी करते ही।।

शिकायत किससे करे असहाय सी 'उपदेश'।
घर की चारदीवारी में खुद को बंद करते ही।।

शिक्षित नारी की व्यथा नारों में दबती जा रही।
हताश होती रही नारी उत्थान की बाते करते ही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर