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लपेटे में जिसको लेती लपेटती जाती।।

                
                                                         
                            वही बाते घूम-घूम कर भँवर बनाती।
                                                                 
                            
लपेटे में जिसको लेती लपेटती जाती।।

मसला कुछ भी हो घूम फिर कर वहीं।
जो माफ़िक नही उन्हें समेटती जाती।।

खुद में भरी इतनी सैलाब सी लगती।
तजुर्बा उफनता ज़मीं कचोटती जाती।।

लब शोर करते 'उपदेश' चीरती तन्हाई।
आँखों के आँसू पल्लू में समेटती जाती।।

नारी की व्यथा में नारी का ही योगदान।
खुद दहकती दूसरे को चहकाती जाती।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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45 मिनट पहले

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