मोहब्बत जिनकी बोझ बन कर रह गई।
जिन्दगी बिन सहारे दर्द सह कर रह गई।।
बिछुड़कर उनसे तजुर्बा हो गया आखिर।
किस तरह जवानी भी तड़प कर रह गई।।
अपनी औकात में केवल तन्हा आँसू रहा।
मैं दो नाव की सवारी से जुड़ कर रह गई।।
गुरूर के नशे में ख्वाब देखती है 'उपदेश'।
उनकी ख्वाबी जिन्दगी अकड़ कर रह गई।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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