पहले प्रेमिका रही थी आज की अर्धांगिनी।
खुशी होले होले गई जब से कमियाँ गिनी।।
यकीन कैसे करूँ तेरी बात पर बता मुझे।
पहले भी इन्हीं बातो से किसी से नही बनी।।
नौकरी के साथ-साथ ही जीवन यापन रहा।
मगर लिखना नही छोड़ा रही मेरी संजीवनी।।
जिनको यहाँ सुकून मिला वो कहाँ 'उपदेश'।
मैंनें तीरगी न छोड़ी और खोजता रहा रोशनी।।
उम्र बढ़ गई किसी से भी गिले शिकवे नही।
बहुत दिन बाद जाना मैं रहा दुखों की जननी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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