आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरे ख्वाब

                
                                                         
                            प्रेयसी करीब बैठकर जरा भी छूती नही मुझे।
                                                                 
                            
बतियाती इधर-उधर देखकर देखती नही मुझे।।

मेरे ख्वाब कहीं हकीकत न हो जाए उस पल।
अपने यहाँ के तौर-तरीकों को बताती नही मुझे।।

झूठी ही सही मगर वाह-वाही चाहती पल पल।
बहाने बनाकर चली गई गले लगाती नही मुझे।।

मुझे खरी उम्मीद वह भी जरूर मेरा साथ देगी।
हर वक्त पीछे खींचती आगे बढ़ाती नही मुझे।।

फिर भी उसके हौसले बुलन्दियों पर 'उपदेश'।
यार वाकिफ नही मिजाज़ से सताती नही मुझे।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर