मजे में जीने वाले दबाये बैठे थे आवाज।
शीर्ष अदालत ने अनजाने में छेड़ी तान।।
अकड़ ढीली करने को सहारा तिनके का।
सुकून मिलेगा कैसे तकलीफों में जवान।।
मोहब्बत करने वाले भी निकल कर आए।
इकट्ठे होकर एक सुर में देने लगे अज़ान।।
नव जवानों की पुकार अनसुनी करेगें ही।
सुनने वाले बेच कर बैठे हैं अपने कान।।
आता है सदियों बाद जन रक्षकों का रंग।
आईना दिखाते 'उपदेश' करे श्रम दान।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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