आज फिर अतीत में डूबकर लिखा मैंने।
तुम्हारी परछाईं से जोड़कर लिखा मैंने।।
हँसने का हुनर तेरा लाजवाब सोचते ही।
चित्रित होते खूब गहरी तन्हाई में देखा मैंने।।
तेरे अल्फाजों में खनक कायम मानकर।
हवा की तरंगों में गुनगुना कर लिखा मैंने।।
लोगों की निगाह में बेमिसाल निकली तूँ।
दिल की ख्वाहिशे साकार करते देखा मैंने।।
उम्मीद को टूटने से बचा लिया 'उपदेश'।
बेखौफ सहारा वक्त पर लेकर देखा मैंने।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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