आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

खामोशी का आलम भी माकूल लगता

                
                                                         
                            खामोशी का आलम भी माकूल लगता।
                                                                 
                            
रूह का साथ रूह को तरोताजा लगता।।

जिस्म के बंधन कितनी दूर चलेंगे न जानूँ।
इश्क में कुछ नमी कुछ गम नही लगता।।

हर रोज़ यादें वैसी मगर नये रूप में आती।
तेरे संग बीता हुआ पल कम नही लगता।।

तेरा चुपचाप मेरे संग रहना काबिलेतारीफ।
दिल में रहने वाला भी बेगम नही लगता।।

न तुमने कुछ चाहा न मैंने कोई बात किया।
मगर फिर भी धड़कना बेदम नही लगता।।

इश्क शायद इसी को कहते होंगे 'उपदेश'।
समझने के हुनर में कोई भ्रम नही लगता।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर