आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वह क्षण काल्पनिक मरीचिका नही।

                
                                                         
                            तुम छलनी से संभलकर देखना।
                                                                 
                            
चाँद का बिम्ब भी तुम्हें देख लेगा।।

और बादलों के आँचल मे 'उपदेश'।
लजा कर अपना मुँह छिपा लेगा।।

वह क्षण काल्पनिक मरीचिका नही।
अमिट संगम से प्यास को बुझा देगा।।

खुद विधाता साक्षी होंगे मौन प्रेम के।
आशीर्वाद के बतौर भरापूरा घर देगा।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर