आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कहाँ हम

                
                                                         
                            जलन की क्रिया से हम खुद निपट गए।
                                                                 
                            
बस राख ही नही हुए विचार सिमट गए।।

रास्ते समझे ही नही कहाँ हम पहुँच गए।
सादगी से फिसले ईमानदारी के उलट गए।।

अपनी ही चालाकियों में उलझे रहे हम।
ना चाहते हुए शिकायतों के निकट गए।।

दुख के दौर से गुजरना लाजिमी हो गया।
गलतफहमी में पड़कर रस्सी से बट गए।।

शुक्र गुजार हूँ ना चाहते हुए ठोकरों का।
कि वक्त रहते हुए 'उपदेश' के निकट गए।।

मोहब्बत ऐसी जागी हर दर्द को भुलाकर।
दुश्मनी करने वाले परखते हुए पलट गए।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर