संस्कारों की छांव में लाठियां चलाने वाले।
किसी दबाव में भूले प्रशासन देखने वाले।।
चेहरे मुस्कराते वाजिब सी समस्याएं लिये।
इकट्ठे हुए जंतर-मंतर पर न्याय माँगने वाले।।
जीतना चाहते किसको अपने ही बच्चें रहे।
भ्रम में रहे सरकार मज़ाक समझने वाले।।
दुनिया देख रही थी हिम्मत की बाढ़ आई।
निराश हुए 'उपदेश' दांव पेंच चलाने वाले।।
मज़ाक मज़ाक में गंभीर हो गए कॉकरोच।
बड़ी दूरदृष्टि रखते कॉकरोच नाम देने वाले।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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