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हर ठोकर तजुर्बा बनकर सामने आई।

                
                                                         
                            हर ठोकर तजुर्बा बनकर सामने आई।
                                                                 
                            
दर्द के साथ-साथ हमसफ़र साथ लाई।।

निखरना उम्र सिखा देती तजुर्बा देकर।
उनके स्पर्श से जज़्बाती खिलखिलाई।।

मोहब्बत में संघर्ष काबिले तारीफ रहा।
मौका पाते अपनी सखियों को सुनाई।।

मंज़िल खुद-ब-खुद नही मिलती यहाँ।
इतना कहकर थोड़ी आड़ में मुस्कुराई।।

सोहबत सिखाती अपने तरीके के फन।
एक सखी 'उपदेश' सुनकर कुलबुलाई।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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2 महीने पहले

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