हिलोरें आने से चल पड़ी कश्ती रुकी थी।
धड़कने बढ़ने लगी शायद नही थकी थी।।
तकलीफों का फैलाव उजालों में समाया।
उजालों की बेकरारी अभी नही थकी थी।।
सूरज की उगती किरणो से गर्मी बढ़ गई।
परिन्दों ने उड़ान भरी अभी नही थकी थी।।
दिखावे के रिश्ते में मोहब्बत दब गई होगी।
हकीकत की आँधी जोरों पर नही थकी थी।।
ये तन्हा सफर और यादो का लश्कर लेकर।
मिलने मिलाने में कशमकश नही थकी थी।।
मैं साथ दूँगा दिल की तह में उतरो 'उपदेश'।
कहते जिन्दगी महकती रही नही थकी थी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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