आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

लोग कहते है पराये घर में पराई राय मानो

                
                                                         
                            मैं खुद की बनाई सीमाओं में साँस ले रही।
                                                                 
                            
लड़की की परछाई बनकर एहसास ले रही।।

सदियों से मेरे हिस्से में जो तहजीब मिली।
तहजीब की खामोशी को अनायास ले रही।।

इज़्ज़त के खातिर कैद में रहने के बावजूद।
सूरज तक पहुँचने के लिए अभ्यास ले रही।।

लोग कहते है पराये घर में पराई राय मानो।
पराया बताने वालों का पूरा व्यास ले रही।।

कभी तो खुद के नाम की भी दुनिया होगी।
सब के साथ रहते हुए 'उपदेश' श्वास ले रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर