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फर्क़ में हम जीते

                
                                                         
                            फर्क़ पड़ता है उसी फर्क़ में हम जीते।
                                                                 
                            
किसी को क्या मालूम दर्द के घूंट पीते।।

हर किसी को समझा नही सकते हम।
किस्मत अपनी तरफ मोड़ नही सकते।।

इसलिए खुद को जरा तकलीफ़ सहने दो।
वर्ना जबाव के लायक भी रह नही सकते।।

अब दर्द के साथ मुझे बहने दो 'उपदेश'।
तुम्हारे हिसाब से प्रवाह रोक नही सकते।।

कहने वाले तो कहेंगे उनका काम कहना।
दरारों के डर से मकान में रह नही सकते।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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एक घंटा पहले

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