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चाहत जरूरत बनतीं जा रहीं

                
                                                         
                            उनकी आदत रही खन-खना कर हँसने की।
                                                                 
                            
बेझिझक 'उपदेश' साफ-सुथरी बात कहने की।।

आईना देखने की फितरत आज भी है ज़िन्दा।
भरी दुपहरी में नज़र भरकर मुझको देखने की।।

एक इशारा मिल गया मगर हिम्मत नही पड़ती।
रोज रोज अटारी पर चढ़कर आँखें सेंकने की।।

अब तो चाहत जरूरत बनती जा रही धीरे-धीरे।
उनके करीबी की हिम्मत नही पड़ेगी रोकने की।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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1 सप्ताह पहले

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