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बहती नदी

                
                                                         
                            अन्दर की छटपटाहट रिहाई मांग रही।
                                                                 
                            
जान अब नही सोती और न जाग रही।।

उलझी साँसे हृदय पटल के स्पन्दन में।
बहती हुई नदी जैसे किनारा मांग रही।।

आत्मा का विद्रोह शरीर की जंजीरों से।
आत्मा विदा लेने को रिहाई मांग रही।।

अब मुक्ति का स्वप्न आँखों में जाग रहा।
मौत के आगोश में अब सोना चाह रही।।

इतनी शांत पहले कभी न रही 'उपदेश'।
जिन्दगी की किताब पलटना चाह रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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2 महीने पहले

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