मोहब्बत के दौर में दिन रात संगीन कर ली।
खुली आँखों से न मिले तो आँखें बंद कर ली।।
सुबह के वक्त अंगड़ाई कुछ याद लेकर आई।
सच्चा प्यार सोचकर रिश्तेदारी पसन्द कर ली।।
असलियत से रूबरू पति पत्नी बन गए हम।
तकरार स्वाभाविक मानकर आँखें बंद कर ली।।
कभी सोचा नही था निकाले जाएंगे इस घर से।
रिश्ते में लचक आई फिर समझौते चंद कर ली।।
नारी को ही समझना पड़ता है रिश्ता 'उपदेश'।
मुँह में पानी भरकर अपनी किस्मत बंद कर ली।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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