मैं अपने परिवार का माली
मैं अपने परिवार का माली,
दो पौधे मैंने रोपे थे,
पुत्र रूप में अपने आँगन में,
कुछ सपने उनमें बोए थे।
सोचा था, ये बड़े होकर,
विशाल वृक्ष बन जाएँगे,
अपनी शीतल छाया देकर,
कितने मन हर्षाएँगे।
फलों से डालें झुक जाएँगी,
खुशियों के फूल खिलेंगे,
इनकी छाया, इनके फल से,
कितने सपने पूरे होंगे।
मैं भी गर्व से कह पाऊँगा,
इनको मैंने सींचा है,
मेरे श्रम और मेरे सपनों ने,
इनका जीवन खींचा है।
पर समय ने ऐसी राह दिखाई,
सपनों-सा संसार न मिला,
पेड़ बड़ा तो हुआ समय से,
पर वैसा विस्तार न मिला।
न उतनी छाया, न उतने फल,
न वैसी हरियाली है,
जैसी मैंने सोची थी,
वैसी कहाँ खुशहाली है?
वक्त के थपेड़े खाकर,
वह कुछ मुरझाया लगता है,
जिस पर था मुझको बड़ा गर्व,
वह सपना अधूरा लगता है।
मन में उठते कई सवाल,
टूट रहा अभिमान है,
क्या मेरी मेहनत में कमी थी,
या समय ही बलवान है?
दूसरा पौधा अभी छोटा है,
उसका कल अनजान है,
किस दिशा में बढ़ पाएगा,
यह भी एक प्रश्न महान है।
मैं माली बन खड़ा हुआ हूँ,
दोनों को निहार रहा हूँ,
कहाँ चूक मुझसे हो गई,
मन ही मन विचार रहा हूँ।
क्या खाद-पानी कम पड़ गया?
क्या धूप सही दे न पाया?
अपनी व्यस्तताओं में शायद,
क्या मैं समय न दे पाया?
क्या मेरी सीख अधूरी थी?
क्या संस्कारों में कमी रही?
या समय और परिस्थितियों से,
इनकी राह कठिन हुई?
किसको दोष दूँ, किससे पूछूँ,
किसको अपना दर्द सुनाऊँ?
अपनी ही नज़रों में उलझा,
किससे नज़रें मैं मिलाऊँ?
शायद मुझमें कमी रही हो,
शायद मौसम दोषी हो,
शायद बीज की अपनी प्रकृति,
या राह कठिन रही हो।
पर हर पौधा फलता ही नहीं,
यह जीवन की सच्चाई है,
हर माली की हर कोशिश को,
मिलती कहाँ भलाई है?
फिर भी मन में आस बची है,
कुछ प्रयास अभी बाकी हैं,
सूखी शाखों के बीच कहीं,
जीवन की आस अभी बाकी है।
मैं अपने परिवार का माली,
आज स्वयं से पूछ रहा हूँ,
कहाँ कमी रह गई मुझमें,
कहाँ अभी भी चूक रहा हूँ?
क्या केवल मेरा दोष है,
या समय का भी हाथ रहा?
क्या जो चाहा, वही न होना,
जीवन का प्रतिघात रहा ?
मैं माली हूँ, देख रहा हूँ,
समय क्या रंग दिखाएगा,
मेरी मेहनत, मेरे सपनों का,
कल क्या फल मिल पाएगा?
— उमेश मिश्रा
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