मैं अपने पथ का पथिक हूँ, निज कल्याण का ध्यान धरूँ,
जगत् क्या कहता है मेरे विषय में, अब क्यों उसका मान करूँ।
कुछ जन मेरे जीवन पर ही, प्रतिदिन निर्णय लिखते हैं,
स्वयं अज्ञान-तम में डूबे, फिर भी उपदेश वितरित करते हैं।
सत्य जहाँ निःशब्द खड़ा हो, वहाँ वचनों का क्या आधार,
उनकी वाणी में विवेक नहीं, केवल मुखरित अहंकार।
मैं स्वधर्म-पथ पर अग्रसर हूँ, यही मेरा संकल्प उदार,
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