टूटता गिरता रहा मैं, जिंदगी तेरे पथ पर।
फ़िर भी गमन करता रहा,जिंदगी तेरे पथ पर।
अज्ञता से जूझता रहा,जिंदगी तेरे पथ पर।
सरळ मिजाज लुटता रहा,जिंदगी तेरे पथ पर।
चंद रिश्तों की खातिर,ख़ुद से जूझता रहा।
अश्क बन बहते दर्द को,तन्हा ही पीता रहा।
सह वक्त थपेड़ों को मैं, आश में जीता रहा।
अपनों की बेरूखी को,हँसकर टालता रहा।
थी प्रतीक्षा उन्हें मेरे, टूटकर बिखरने की,
पर ढहने से पहले ही,मालिक जोड़ता रहा।
कितनी कसौटी कसैली,थी जीवन के पथ पर।
चुभते रहे शूल फ़िर भी,रहा गतिमान पथ पर।
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