कितने तीर पार करें
कितने रुप रुग्ण भये
अन्तद्वन्द है की जाता नहीं
भीतर बहुरंगा मैल है
सामना करूं फिर क्या इंसान का
करुण स्वर भी समझाता रहा
वीभत्सा ही साथ चलता रहा
कितने तीर पार करें
कितने रुप रुग्ण भये
मानुष है शायद
फिर क्यो कलंकित तृष्णा के स्वर
जनमानुष के पार भये
कितने तीर पार करें
कितने रुप रुग्ण भये
ये भ्रम है कि
सब पाये है
नियति का जब
कोप होगा
पर्याप्त सामर्थ होगा
फिर भी
नियति का ही
निमन्त्रण स्वीकार होगा
कितने तीर पार करें
कितने रुप रुग्ण भये
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...................... ---- बिजय जोशी
(पिथौरागढ़)
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