जय शंभु कैलाशी उदाशी नीलकंठ उमापती।
कर शूलधारी भुजग़हारी त्रिपुरारि जगतपती ।।
अंग भस्म राजत शशि विराजत भाल पे छवि सोहती।
बामांग में गिरिजा, गजानन गोद में सोहे अती।।
प्रभु विश्वरूप नमामि ईश्वर, जगत के निर्वाण हो।
कण कण में व्यापक अघ विनाशक वेद के प्रभु प्राण हो।।
निर्गुण स्वरूप अनूप रूप निरीह के परित्राण हो।
कल्याण कारक जन उद्धारक वेद और पुराण हो।।
संसार वट की मूल और तुरीय भी तुम ही प्रभू।
प्रभु काल के भी काल और कृपाल भी तुम ही प्रभू।।
गोतीत ज्ञानातीत और गिरीश के भी ईश हो।
अज नारदादि सुरेश वंदित ईश के परमेश हो।।
त्रय ताप नाशक खल विनाशक है त्रिशूल भयंकरा।
त्रय नेत्र धारक प्रलय कारक नाम है प्रळ्यंकरा।।
संग भूत प्रेत पिशाच नाचत वासुकी गर फूंकरा।
डिम डिम डिमक डमरु बजावत नाचते शिव शंकरा।।
नन्दी कि पृष्ठ सवार हो संसार रखवारी करो।
इस सूखते संसार की निज गंग से क्यारी भरो।।
वीरन करें विनती प्रभू मुझ पे कृपा कर दीजिए।
निज हाथ में ले हाथ अब सानाथ मुझको कीजिए।।
-भवानी शंकर तिवारी
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