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खुद से बाहर आकर

                
                                                         
                            मैं देखना चाहता हूँ
                                                                 
                            

मैं देखना चाहता हूँ
खुद को,
खुद से बाहर आकर।

जानना चाहता हूँ—
क्या हूँ मैं?

खुद से अलग होकर
देखना चाहता हूँ,
क्या हारता हूँ मैं,
या जीत जाता हूँ?
या फिर अनजाने में
किसी को तकलीफ़ दे जाता हूँ?

क्या मैं एक ख़्वाब हूँ,
या कोई हक़ीक़त?

क्या मैं सच में
एक सच्चा इंसान हूँ?
या सच और झूठ के बीच
कहीं भटकता हुआ एक चेहरा?

मैं देखना चाहता हूँ
खुद को—
इस जहाँ में जीता हुआ।

परखना चाहता हूँ
एक बेटे को,
एक पिता को,
एक पति को,
एक भाई को,
एक दोस्त को,
एक रिश्तेदार को,
और सबसे बढ़कर—
एक इंसान को।

फिर कहना चाहता हूँ
एक सच,
खुद की आँखों में देखकर,
खुद से बाहर आकर—

कि मैं वास्तव में क्या हूँ।
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3 महीने पहले

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