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शिकस्ता-दिली में तुम

                
                                                         
                            आज मैं उदास हूँ,
                                                                 
                            
हाँ, बहुत उदास हूँ।
मगर ऐसा क्यों होता है हर बार
कि मेरी हर शिकस्ता-दिली में
सिर्फ़ तुम मेरे साथ होते हो?
हवाएँ, महताब, तारे और शब—
इस कायनात के कितने ही रंग हैं,
मगर तुम
बेहद उजले हो—
आसमान की तरह बिल्कुल बेदाग़,
समंदर की तरह बहुत पुरसुकून।
तुम्हारी ये ख़ामोशी
कभी ख़ंजर-सी लगती है—
बहुत तेज़, बहुत सख़्त,
और कभी
तारीकी को चीरती हुई
नूर की तरह।
ख़ाक हैं, ख़ाक हैं ये जिस्म-ए-जंजाल की दुनिया,
इक फ़रेब-ए-वहशत है ये ख़याल की दुनिया।
ज़िंदगी के सहरा में तिश्नगी है साए की,
धूप के सफ़र में बस इक मलाल की दुनिया।
बहुत मुश्किल है
कि अब यहाँ कोई धूप उतरे—
हर सू तारीकी है,
जैसे ये दुनिया नहीं,
बस एक बहुत लंबी रात हो।
और मैं, मैं...
तुम्हें अपनी पनाह में लिए
यूँ ही भटकता रहता हूँ,
जैसे साँसों की आख़िरी हद तक
तुम्हें बचाए रखना हो मुझे।
जैसे मेरे बातिन में
अब तुम्हारे सिवा
कुछ भी बाक़ी नहीं रहा—
न कोई सदा,
न कोई तमन्ना,
न कोई दुनिया...
बस तुम,
मेरी उदासी के बिल्कुल उजले आसमान में
एक ख़ामोश महताब की तरह—
और मैं,
तुम्हारी रोशनी में
धीरे-धीरे
फ़ना होता हुआ।
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एक महीने पहले

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