श्रद्धा-सागर उठ रहा हैं,
नदियों का दम घुट रहा हैं
जो भी उसको सजदा करता,
वही उसको लूट रहा हैं
बेघर हो गई मछलियां सारी,
मकाँ उनका टूट रहा हैं
हो चली हैं नीरव सरिता,
प्राण उसका छूट रहा हैं
- देवर्षी मनीष येंडे
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