अधरों पर रहती थी कभी, उमंगों की तितलियाँ,
नयनों की झील में, तैरती थी स्वप्न भरी नैया,
अब खोजती फिरती हूँ, चहुं दिशा, राह-गलियाँ,
खो गई है जाने कहाँ, मेरी बचपन की सहेलियाँ॥
माँ ने टांके थे आँचल में, उजले सितारें जो नेह के,
देखे थे बाबुल की आँखों में, मैंने अर्णव स्नेह के,
भाई-बहना के संग खेली आँगन मिल-जुल कर,
बाँध नदिया पर बना, लहरें भूली अठखेलियाँ॥
आँगन की क्यों मैं चिड़िया, क्यों होती हूँ पराई
जगत में विदाई की रीत ये, कहो किसने बनाई
यौवन के स्वप्न ठिठके रहें बाबुल की देहरी पर
मात-पिता रोते रहें, बिलख कर जाती बेटियाँ॥
प्रेम की क्षुधा कब मिटी,कब आकंठ डूबी प्रेम में,
कब मिलन की आस पूरी, न लहरें उठी देह में
आएंगे प्रियतम, नाव बांधेंगे इस ठाँव भी कभी ,
सोचती पनघट पर खड़ी उदास-सी पनिहारियाँ॥
-सुषमा गजापुरे
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