मैं अपने इन बुरे हालातो का क्या करूं?
दिन तो गुजर जाता है ,इन रातों का क्या करूं?
तर्क-ए- शायरी तो मैं कब का कर चुका होता,
मगर दिल में उठते इन जज्बातों का क्या करूं?
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