मैंने यात्रा
कभी टिकट से नहीं शुरू की,
वह हमेशा
एक हल्की-सी बेचैनी से जन्मी—
जो घर में रहते हुए
घर से बाहर देखने लगती है।
पहला कदम
नक़्शे पर नहीं पड़ा,
वह मन के उस कोने में उतरा
जहाँ डर
और जिज्ञासा
बराबर जगह घेरते हैं।
रास्ते मिले—
कुछ पक्के,
कुछ कच्चे,
और कुछ ऐसे
जो चढ़ाई बनकर
धैर्य माँगते थे।
जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ी,
शहर पीछे छूटता गया—
उसका शोर
पत्थरों में
घिसकर
खामोशी बन गया।
पहाड़
सिर्फ़ ऊँचाइयाँ नहीं थे,
वे ठहरे हुए समय थे—
जिनकी छाया में
मेरे भीतर की
जल्दबाज़ी
धीरे-धीरे
थकने लगी।
चीड़ और देवदार
हवा से बात करते रहे,
उनकी सरसराहट में
कोई उपदेश नहीं था,
बस इतना आग्रह था—
धीरे चलो।
घुमावदार रास्तों पर
हर मोड़
एक दृश्य खोल देता था—
कभी गहरी खाई
जहाँ डर ने
हाथ कसकर थामा,
कभी अचानक खुलता
नीला आकाश
जहाँ भरोसा
अपने आप आ गया।
एक पहाड़ी गाँव में
धुएँ से उठती
साँझ देखी—
छोटे-छोटे घर
टिन की छतों पर
ठहरती धूप
और लोगों के चेहरों पर
बिना जल्दबाज़ी की
मुस्कान।
नदियाँ
यहाँ भी मिलीं,
लेकिन वे मैदान जैसी नहीं थीं—
वे पत्थरों से टकराती हुई
भी
अपना रास्ता जानती थीं
जैसे सिखा रही हों
कि बाधाएँ
बहाव रोकती नहीं
उसे अर्थ देती हैं।
रात
पहाड़ों में
कुछ और ही होती है—
अंधेरी नहीं,
गंभीर
तारों की इतनी निकटता
कि लगता है
आसमान
सुन रहा है।
ठंड
हड्डियों तक उतरती है
लेकिन भीतर
एक अजीब-सा सुकून
जागता है—
कि जीवन
सिर्फ़ सुविधा नहीं
सहनशीलता भी है।
सुबह
कोहरे के पीछे से
सूरज का निकलना
किसी विजय जैसा नहीं
बल्कि
एक शांत सहमति जैसा था—
कि आज भी
चलना है।
लौटते समय
बैग में
स्मृति के पत्थर थे—
कुछ भारी
कुछ चिकने
सब सच्चे।
घर पहुँचा
तो सब कुछ वैसा ही था
लेकिन मेरी दृष्टि
थोड़ी ऊँचाई पकड़ चुकी थी—
अब छोटी बातें
वैसी चोट नहीं पहुँचातीं।
मैं समझ पाया,
यात्रा-वृतांत
स्थानों का विवरण नहीं
वह उन ऊँचाइयों का लेखा है
जहाँ मन
अपने डर से
थोड़ा ऊपर उठता है।
और शायद
यात्रा
इसीलिए ज़रूरी है—
ताकि हम
हर बार लौटते हुए
थोड़े कम
और
थोड़े अधिक
मनुष्य हो रहें।
- तेजपाल सिंह 'तेज'
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