मेरे हिस्से का प्यार
एक ऐसा प्रश्न था
जिसका उत्तर
कभी
किसी मनुष्य ने नहीं दिया।
वह पहले
एक आधार के रूप में आया—
दिखाई न देने वाला,
पर हर कदम के नीचे मौजूद।
एक दिन
ज़मीन ने
अपनी आदत बदल ली,
और मैं समझ गया
कि सहारा
कभी वादा नहीं होता।
फिर एक उष्मा थी—
जो सिखाती थी
कि जीवन
केवल चलना नहीं,
पिघलना भी है।
जब वह उष्मा हट गई,
तो ठंड ने
मुझसे परिचय कराया—
और मैंने जाना
कि शून्य
हमेशा बाहर नहीं होता।
समय बीता।
एक संरचना मिली—
नियमों, अपेक्षाओं
और साथ कहलाने की।
उसमें
खामोशी गूँजती थी,
और शब्द
अपने अर्थ खो देते थे।
मैं वहाँ रहा,
क्योंकि रहना
भी एक अभ्यास है।
तब मुझे बोध हुआ—
कि प्रेम
कभी व्यक्ति नहीं होता,
वह एक स्थिति है
जिसमें चेतना
खुद को पहचानती है।
जिसे कम मिला,
उसने जोड़ना सीखा।
जिसे छिन गया,
उसने अर्थ रचना सीखी।
मेरे हिस्से का प्यार
इसलिए
कमी नहीं,
एक पद्धति बन गया—
कम में पूर्ण होने की।
अब मैं
न किसी छाया की प्रतीक्षा करता हूँ,
न उष्मा की याचना।
मैं जानता हूँ—
जो भीतर टिक जाए,
उसे खोया नहीं जा सकता।
और शायद
यही
मेरे हिस्से का प्यार था।
- तेजपाल सिंह 'तेज'
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