शीर्षक:वक्त की विवशता
भरे कौन साहस, खरा सा हुआ है।
यहां आदमी तो, डरा सा हुआ है।।
नियम कायदे हैं, न ईमान का धन।
नज़र है बताती, बिका सा हुआ है।।
दबा जो हुआ था, दबे जा रहा है।
उठाने को आए, ठगा-सा हुआ है।।
रहे भांँग जोबन, यहां दो दिनों का।
कहावत पुरानी, दिलासा हुआ है।।
न वैसा रहा था, न ऐसा रहेगा।
रखो धीर यारों, खुलासा हुआ है।।
त्रिलोचन जोशी
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