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नीम का पेड़

                
                                                         
                            खुले आसमान के नीचे,
                                                                 
                            
एक नीम की छाँव में।
लेटा था एक खाट पर,
पानी का मटका पास।
एक मिर्च, एक प्याज़,
एक बाजरे की रोटी,
इतने भर में संतुष्टि थी,
जीवन था जैसे अक्षय।

सहसा दूर दिखा,
एक विशाल बरगद का पेड़।
जटाएँ उसकी लंबी-लंबी,
आश्रय देता बहुतायत को,
लगने लगी नीम की छाँव,
कुछ असहज सी कमतरी में।
बरगद का पेड़ नहीं दिखता,
दिखता उसे मानो अंतिम लक्ष्य।

दौड़ पड़ा बरगद की ओर,
चरैवेति - चरैवेति।
थक गया, रुक गया,
दोनों पेड़ों के बीच खड़ा,
आखिर दम तोड़ देता है,
कड़ी धूप में, निर्जल।
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एक घंटा पहले

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