आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मार्केटिंग

                
                                                         
                            एक 'सैल्स-एक्सक्यूटिव' ने
                                                                 
                            
मेरा दरवाजा खटखटाया,
और सभी उत्पादों का
देर तक गुणगान गाया,
उन सभी का उसने-
सैंपल भी दिखाया ।

सर ! ये 'परिश्रम' है-
जो पुरानी चीज़ है,
और ये फैशन है /
जो घर-घर चलती है
ये 'सलीका' और ये ' सहूर' है
जो युवाओं से बहुत दूर है
ये 'भाग्य' और ये 'भगवान' हैं
इनके लाभों से सभी अनजान हैं ।

ये 'चापलूसी' और ये है 'बेईमानी'
इनकी तारीफ तो कई करेंगें / मुंहजबानी

और सर, ये 'ईमानदारी' है-
जिसे चाहती तो दुनिया सारी है
कीमत भी बड़ी भारी है / पर बिकती नहीं है
वैसे दुनियादारी में-
ये दिखती भी नहीं है ।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर