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जोगी और मैं

                
                                                         
                            एक बात जो-
                                                                 
                            
प्रसन्नता लाती है,
हताश करती है,
गुस्सा दिलाती है,
निराश करती है,
उम्मीद भी जगाती है
विकास की याद दिलाती है ।

एक ही आसमां जो-
हर जगह है
एकता और मिलजुलकर रहने का
संदेश देती है-
विचार के लिए, "वसुधैव कुटुंबकम्"
देश- काल से बाहर
व्यवहार करना / विनम्रता से
सुदूर / झुककर जमीं से गले मिलते हुए

फिर भी क्यों कर है हृदय-
दो फाड़ / मनुष्य-मनुष्य में भेद
जाति-जाति में भेद,
समाज-समाज में भेद,
राष्ट्र-राष्ट् में भेद

क्यों कर होती है / हर कोशिशें बेकार
सोचता हूं हर बार
"जोगी और मैं"

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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