प्रेम-पत्र
उनका प्रेम पत्र
उनके भांति संवेदनशील था
शब्द जैसे नैसर्गिक थे
अनुभूति आज भी अक्षुण्ण है।
मैं आश्चर्यचकित हो जाती हूं
आज भी ,उसे एक बार और पढ़ के
क्यूंकि उन्होंने वही लिखा था
जो प्रारब्ध था
जैसे..
राधा कृष्ण का मिलन प्रारब्ध था
सीता का वनवास प्रारब्ध था
सती का समर्पण अग्नि कुंड को प्रारब्ध था
ठीक वैसे ही...
मेरा प्रतीक्षा करना
उस प्रेम-पत्र के सहारे प्रारब्ध है।
(अर्थ 👇
नैसर्गिक:- प्राकृतिक ,वास्तविक
अक्षुण्ण:- अखंडित ,समूचा
अनुभूति :- एहसास
प्रारब्ध:- जो प्रकृति द्वारा पहले से तय हो)
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