क्या तुम्हें बताऊं माँ की अज़मत क्या होती है।
महसूस करो ख़ुद लफ़्ज़ों से न बयाँ होती है।।
पैदा किया पाला पोसा गोदी में खिलाया।
ख़ुद गीले में सो कर सूखे में है मुझे सुलाया।।
चूल्हे की आग में तपकर कुंदन है मुझे बनाया।।
पांवों में है जिसके जन्नत वो माँ होती है।।
काँटे चुन चुन राहों में फूल बिछाती जाये।
गर चाक जिगर कर भी दो मुँह पे उफ़ न लाये।
ठोकर लगे जब भी तुमको तो उसकी यही आवाज़ आये।
क्या चोट लगी बेटा तुमको वो माँ होती है।।
मौला ने दिया मौक़ा मुझको पर काम न आया।
मां की ख़िदमत मैं कर न सका दिल उसका दुखाया।।
मिट्टी में मिली मिट्टी उसकी तब समझ में आया।
औलाद पे कर दे जां क़ुर्बान वो माँ होती है।।
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