त्योहार के असली मायने उनसे पूछो,
जो अपनों से दूर किसी शहर में
अपने सपने बुन रहे होते हैं।
जाना तो वो भी चाहते होंगे घर,
माँ के हाथों का खाना खाना चाहते होंगे,
अपनों के साथ बैठकर हँसना चाहते होंगे।
पर क्या हर कोई त्योहार पर घर जा पाता है?
क्या हर कोई अपनों के बीच
वो खुशियाँ मना पाता है?
एक वक्त था, जब त्योहार का इंतज़ार
महीनों पहले से हुआ करता था।
नए कपड़ों की जिद, मिठाइयों की खुशबू,
और घर भर में गूँजती हँसी,
बस इन्हीं में तो त्योहार बसा करता था।
अब त्योहार आते हैं और गुजर जाते हैं,
कभी काम, कभी ज़िम्मेदारियाँ रोक लेती हैं।
अब न नए कपड़ों की वो जिद है,
न बचपन जैसी वो खुशी।
शायद हम बड़े हो गए हैं,
या खुश रहने के मायने बदल गए हैं।
घर से दूर त्योहार मनाते हुए
सब कुछ तो होता है, बस अपने नहीं होते।
माँ के हाथों का खाना याद आता है,
पापा की बातें और दोस्तों की महफ़िल याद आती है।
फोन पर अपनों को हँसते हुए देखकर
हम भी मुस्कुरा तो देते हैं,
पर फोन कटते ही घर की याद
आँखों में उतर आती है।
हम अपने सपनों को पूरा करने निकले थे,
और आज उन्हीं सपनों के लिए
अपनों से दूर रहते हैं।
शायद बड़े होने की कीमत यही है,
कि जिनके साथ हर खुशी मनाई थी,
आज उन्हीं के बिना त्योहार मनाते हैं।
अब समझ आता है,
त्योहार नए कपड़ों या रोशनी का नाम नहीं,
त्योहार तो अपनों के साथ होने का नाम है।
क्योंकि घर से दूर रहकर जाना है हमने,
कि सबसे खूबसूरत तोहफा कोई चीज़ नहीं,
बल्कि अपनों के साथ बिताया हुआ वक्त है।
-स्वाति सुमन
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