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आत्म-सम्मान की परवाज़

                
                                                         
                            ज़िंदगी की हर एक चुनौती को,
                                                                 
                            
अब एक नया मोड़ देना है।
राह में आए हर इक तूफ़ान को,
अपनी हिम्मत से मोड़ देना है।
छा जाए चाहे जितना भी अँधेरा,
रोशनी बनकर तुमको जगमगाना है।
अपनी मेहनत, अपनी लगन से,
एक नया इतिहास बनाना है।
हो हौसला बुलंद इतना कि,
हर मंज़िल तुम्हारे आगे झुक जाए।
रुकना नहीं, कभी झुकना नहीं,
चाहे राह में कितने ही कांटे आएँ।
दृढ़ इरादों और अडिग लगन में,
वो बात है, वो सच्ची आग है।
अपनी ही ख़ातिर जीना अब,
सफलता का नया चिराग है।
स्वर्णा की उस चमक जैसी,
अपनी पहचान खुद बनानी है।
ज़माने की बंदिशों को तोड़कर,
अपनी नई कहानी लिख जानी है।
पंख खोलो और उड़ चलो अब,
ये पूरा आसमान भी छोटा लगेगा।
ज़िद हो अगर दिल में सच्ची,
तो हर सपना सच होकर दिखेगा।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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