माइक्रोस्कोप लेकर घूमते रहिए,
औरों में कमियां ढूंढते रहिए।
अपने चेहरे की धूल तो दिखती नहीं,
गैरों के दामन के दाग गिनते रहिए।
खुद के गिरेबान में झाँकने की फुर्सत कहाँ,
बस दूसरों के आंगन के तिनके चुनते रहिए।
दुनिया को सुधारने का गुरूर है सर पर,
खुद की गिरती दीवार को भूलते रहिए।
क्या हासिल होगा उम्र भर की इस नुक्ताचीनी से?
रिश्तों के नाज़ुक धागों को यूँ ही उधेड़ते रहिए।
दूसरों के हिस्से का अँधेरा तो दिख गया आपको,
अपने भीतर छिपे सायों को पालते रहिए।
दूसरों के सफर पर उंगलियां उठाना आसान है,
खुद एक कदम भी चलने से कतराते रहिए।
कभी अपने आईने से भी तो गुफ़्तगू कीजिए,
या ताउम्र बस यही भूल करते रहिए।
माइक्रोस्कोप लेकर घूमते रहिए,
औरों में कमियां ढूंढते रहिए।
-स्वर्ण सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X