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तुम्हारी ज़िन्दगी का आइना हूँ मैं

                
                                                         
                            तुम्हारी ज़िन्दगी का आइना हूँ मैं
                                                                 
                            
तुझे नजदीक से बस देखता हूँ मैं

मिरी आदत नहीं बदली पुरानी वो
अकेले में तुम्हे ही सोचता हूँ मैं

नसीहत देने से पहले जरा सुन लो
गली सब पुर-खतर गुजरा हुआ हूँ मैं

समझ ले बात को आसान लफ्जों में
वगरना पर कतरना जानता हूँ मैं

मेरे आने में शायद शाम होगी अब
सुबह घर से कहीं तो लापता हूँ मैं

तू अपने इल्म की तस्दीक कर ले फिर
सहारे बिन कहाँ जिन्दा रहा हूँ मैं

तुम्हारा साथ पाने को तरसता था
ये किस्मत को बदलना चाहता हूँ मैं

मिरी विनती कभी सुन लो घड़ी भर तुम
बहुत कम आजकल जो बोलता हूँ मैं

किनारा हूँ नदी का खौफ तो खाओ
जरा सी बाढ़ में बस टूटता हूँ मैं

यही एहसान तेरा कम नहीं मानूँ
समझती है तिरा ही हौसला हूँ मैं
-सुशील यादव दुर्ग
 
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2 महीने पहले

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