अरमान के पंछी जब , आकाश उड़ा रखना
धडकन को मिरे दिल की ,नाहक ना बढ़ा रखना
तुम देख नहीं पाती , आजाद जमाने में
कैसे रखा जाता है , मसलों को जला रखना
चुप- चाप सहा जाए, गर जुल्म अकेले तो
भरपूर इरादों की , दूकान सजा रखना
अपने ही यहाँ देते , जी भर के मुसीबत भी
अपनों से यहाँ दूरी , मजबूर निभा रखना
आदत नहीं अच्छी ये, लोगों से शिकायत हो
हर हाल हकीकत को , आपस में बता रखना
सीखो अभी तुमको है ,पाना अभी धोखे भी
माहौल अभी डर का ,अच्छा है बना रखना
परचम तिरे हाथों में ,आवाज बुलंदी में
रोके जो ज़माना तो , आकाश हिला रखना
जो तीर निशाने से ,तिरछे कहीं पड़ती है
उस तीर के एवज में , शमशीर उठा रखना
मिलते हो कभी हमसे , पहचान हो बरसों की
जी भर के नहीं मिलता , यादव से गिला रखना
-सुशील यादव दुर्ग
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