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अल्फाज के गिरोह से भिड़ने नहीं गए

                
                                                         
                            अल्फाज के गिरोह से भिड़ने नहीं गए
                                                                 
                            
जंगल के आदमी कभी लड़ने नहीं गए

अरमान पूरे होते गए माँगे ही बिना
हम आसमा क़रीब भी थोड़े नहीं गए

बे वक्त आ गया तुझी पे मेरा दिल कहीं
बेखौफ हो के हम कहीं छोड़े नहीं गए

चूहों की थी जमात भी अपनी मगर कभी
नुकसान के इरादे कुतरने नहीं गए

चाहे बना लो तुम यहाँ शीशों का भी महल
पत्थर ले कर के दर पे उतरने नहीं गए

सरहद पे होती सख्त निगहबानी सोच के
आराम की तलब में भगोड़े नहीं गए

हम भी बरहना हो कहाँ गंगा में तैरते
कपडे हमारे सूखे निचोड़े नहीं गए

हमको पसंद है तिरी हर सादगी यहाँ
कुछ आदतें उसूल से मोड़े नहीं गए

पर्बत से टकरा जाते बिना बात के कभी
लहजों के नर्म ये मिरे घोड़े नहीं गए

"हमने ख़ुलूस-ए-दिल से जो पाई है ये जगह,
ऊँचे मकान पे कभी चढ़ने नहीं गए"
-सुशीलयादव
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2 महीने पहले

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