दिल में अब पहले-सा कोई गुमाँ नहीं है,
तेरे बिन भी मगर दिल बे-ज़बाँ नहीं है।
तेरी ख़ामोश निगाहों का असर बाक़ी है,
वरना आँखों में कोई राज़-ए-निहाँ नहीं है।
हमने हर दर्द को तहज़ीब से पाला है मगर,
दर्द कहने के लिए कोई ज़बाँ नहीं है।
जिसको समझा था कभी अपनी वफ़ाओं का अमीन,
आज उस शख़्स का कोई भी निशाँ नहीं है।
हिज्र की रात ने इतना तो सिखाया हमको,
हर अँधेरा हमेशा का आसमाँ नहीं है।
तेरी यादों के सहारे जो सफ़र जारी है,
इस मुसाफ़िर के लिए कोई कारवाँ नहीं है।
हमने दुनिया के लिए ख़ुद को तमाशा न किया,
दिल की दहलीज़ पे हर शख़्स मेहरबाँ नहीं है।
कितने चेहरों में तलाशा है तुझे ऐ जानाँ,
कोई चेहरा तेरे जैसा दरमियाँ नहीं है।
इश्क़ में हार भी इक फ़ख़्र हुआ करती है,
हर शिकस्त अपनी नज़रों में ज़ियाँ नहीं है।
हमने ख़ुद को भी कई बार परखा है मगर,
हर सफ़र लौट के आने का मकाँ नहीं है।
‘बाबरा’ इश्क़ की तफ़्सीर भला कौन करे,
दिल की दास्ताँ का कोई भी बयाँ नहीं है।
-सुशील कुमार ‘बाबरा’
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