झुक के जीने से तो मर जाना कहीं बेहतर है,
सर उठा कर जो जिए वो ही सुख़नवर बेहतर है।
ताम-ओ-तूरिश की तलब में न गँवा अपनी अना,
रूखी-सूखी जो मिले नफ़्स को शक्कर बेहतर है।
ज़ुल्म के सामने ख़ामोश रहे जो इंसान,
उस मुसाफ़िर से तो राहों का ये पत्थर बेहतर है।
हम ने सीखा ही नहीं दस्त-ए-सवाल फैलाना,
अपनी ग़ुरबत का सजाया हुआ बिस्तर बेहतर है।
लाख जलते रहें महलों में चराग़-ए-दौलत,
झोंपड़ी का जो जले वो ही मुनव्वर बेहतर है।
ग़ैर के साए में राहत की तमन्ना कैसी,
धूप में कटती रहे अपनी ही चादर बेहतर है।
क़द्र-दानों की यहाँ भीड़ लगी हो शायद,
दिल के अहसास का पर एक ही जौहर बेहतर है।
ज़ेहन आज़ाद रहे सोच की परवाज़ के साथ,
क़ैद-ए-हस्ती से बयाबाँ का वो मंज़र बेहतर है।
झूठी तारीफ़ के फूलों से लहू रिसता है,
आईना सच जो दिखाए वही ख़ंजर बेहतर है।
दोस्ती के लिए हर शख़्स पे मत कर तकिया,
बे-वफ़ा यार से सच-मुच का सितमगर बेहतर है।
अपनी ख़ुद्दारी पे क़ाइम रहा तू ऐ 'बाबरा',
ताज-ए-शाही से तिरा ख़ाक का पैकर बेहतर है।
- सुशील कुमार 'बाबरा'
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