वक़्त गुज़रा तो कभी वापस बुलाया न गया,
जो गया हाथ से, फिर हाथ में आया न गया।
उम्र भर लोग मकानों को सजाते ही रहे,
दिल का वीरान नगर उनसे बसाया न गया।
सिर्फ़ दौलत से नहीं मिलती है इज़्ज़त की महक,
ये ख़ज़ाना है, किसी दाम में पाया न गया।
अपनी ग़लती का अगर वक़्त पे एहसास न हो,
फिर कोई ज़ख़्म दुआओँ से मिटाया न गया।
धूप सहने का हुनर जिसने ज़माने से लिया,
उसके हिस्से का उजाला कभी छाया न गया।
ख़ुद से मिलने की फ़ुरसत भी न मिली उम्र भर,
और इल्ज़ाम था—दुनिया को निभाया न गया।
जो भी रिश्ते थे, अदब और वफ़ा से महके,
ज़ोर से खींच के कोई भी बचाया न गया।
सर झुकाने से अगर कम हो किसी का भी गुरूर,
ऐसा सज्दा तो कभी रब को दिखाया न गया।
वक़्त, सम्मान और भरोसा हैं अमानत रब की,
इनका सौदा किसी बाज़ार में भाया न गया।
हर घड़ी सोच-समझ कर ही उठाना क़दम,
एक ठोकर का सफ़र फिर से दोहराया न गया।
'बाबरा' छोड़ गया जो भी मुहब्बत की महक,
वो किसी गर्द-ए-ज़माना से मिटाया न गया।
-सुशील कुमार 'बाबरा'
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