है बच्चों के निवाले पर पहरा कैसा?
दिखावे पर है फिर ये खर्च गहरा कैसा?
तन ढकने को कपड़ा मयस्सर नहीं जिन्हें,
उनके सामने है ये आलीशान डेरा कैसा?
रोटी के बिन बिलख रही है अबोध जनता,
सिंहासन पर बैठा है अंधेर-नगरी का राजा कैसा?
महलों की दीवारों पर हो रही है पेंटिंग हर रोज़,
मज़दूर की झोपड़ी में है ये पसरा अँधेरा कैसा?
भूखी आँखों में पलते हैं हज़ारों सवाल,
इश्तिहारों में हँसता हुआ ये चेहरा कैसा?
सच को छुपाकर झूठ को परोसने की साज़िश है,
आखिर कब तक चलेगा ये फ़रेब का फेरा कैसा?
-सुशील कुमार 'बाबरा'
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