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"हासिल-ए-उम्र"

                
                                                         
                            सुशील कुमार 'बाबरा'
                                                                 
                            

हर एक ज़ख़्म को सीने में रख के सीखा है,
ये फ़न-ए-ज़ीस्त बहुत ठोकरें खा के सीखा है।

कभी ख़ुलूस ने लूटा, कभी वफ़ा ने रुलाया,
हमने इंसाँ को क़रीब आ के सीखा है।

जो मुस्कुरा रहा है, ज़रूरी नहीं कि ख़ुश भी हो,
ये राज़ अश्कों को चुपके छुपा के सीखा है।

हर एक शख़्स यहाँ अपने दर्द का क़ैदी है,
ये फ़लसफ़ा कई चेहरों को पढ़ के सीखा है।

न ताज, न तख़्त, न दौलत किसी के साथ चली,
ये हक़ीक़त मैंने जनाज़े उठा के सीखा है।

बड़ी अजीब है दुनिया—गिरा के हँसती है,
मगर सँभलना भी हमने गिरा के सीखा है।

कभी ग़ुरूर ने इंसाँ को आदमी न रहने दिया,
अदब का रास्ता हमने झुका के सीखा है।

जो अपने दर्द को अल्फ़ाज़ की ज़ुबाँ दे दे,
सुख़न का रुत्बा उसी ने निभा के सीखा है।

वो लोग क्या हैं जिन्हें इश्क़ का गुमाँ भी नहीं,
हमने तो रूह को जल-जल के सीखा है।

सवाल उम्र ने पूछे तो लब ख़मोश रहे,
हर एक जवाब मगर दिल जला के सीखा है।

'बाबरा' अभी तो उम्र ने तहज़ीब-ए-ग़म सिखाई है,
हमने जीना भी ख़ुद अपने मिटा के सीखा है।
-सुशील कुमार 'बाबरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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