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“दर्द की तफ़्सीर”

                
                                                         
                            दिल की वीरानियों का राज़ छुपाएँ कहाँ तक,
                                                                 
                            
दर्द बढ़ता ही रहे, ख़ुद को बचाएँ कहाँ तक।

हिज्र की रात है, तन्हाई का आलम है यहाँ,
चाँद से अपना फ़साना भी सुनाएँ कहाँ तक।

जिसकी चौखट पे रखी हमने मोहब्बत की जबीं,
वो ही पूछे कि ये सजदा है, निभाएँ कहाँ तक।

इश्क़ ने हमको सिखाया है फ़ना का फ़लसफ़ा,
ख़ुद को मिटने से भला ख़ुद को बचाएँ कहाँ तक।

तेरी यादों का धुआँ आँख में ठहरा है अभी,
रात ढल जाए तो ये अश्क छुपाएँ कहाँ तक।

ज़ख़्म-ए-दिल को भी ज़माने से छुपाना है मगर,
लोग पूछें तो भला दर्द बताएँ कहाँ तक।

हमने हर ख़्वाब तेरे नाम की अमानत समझा,
अब इन्हें टूटते देखेंगे, सजाएँ कहाँ तक।

वक़्त हर रोज़ नया ज़ख़्म अता करता है,
ज़ख़्म गिनते ही रहें, उम्र गिनाएँ कहाँ तक।

अपनी हस्ती को तेरी राह में खो बैठे हैं,
अब ये पूछे कोई हम कौन हैं—बताएँ कहाँ तक।

वस्ल की आस भी बाक़ी है, फ़ुर्क़त भी है,
एक ही दिल में दो आलम को बसाएँ कहाँ तक।

‘बाबरा’ इश्क़ अगर रूह की आवाज़ है तो,
इसको दुनिया की ज़बाँ में हम सुनाएँ कहाँ तक।
- सुशील कुमार ‘बाबरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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