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"बाबरा-एहसास-ए-वफ़ा"

                
                                                         
                            दिल के वीराने में इक शमअ जला रक्खी है,
                                                                 
                            
हम ने यादों की फ़ज़ा दिल में बसा रक्खी है।

आईना देख के जो लोग सँवरते हैं सदा,
उन से कह दो कि यहाँ रूह छुपा रक्खी है।

तू कभी आ के ज़रा देख शिकस्ता दिल को,
हम ने पलकों पे तिरी आस सजा रक्खी है।

वक़्त की तेज़ हवाओं का असर क्या होगा,
हम ने उल्फ़त की बुज़ुर्गों सी दुआ रक्खी है।

हम से मत पूछ तिरे बाद गुज़ारी कैसे,
ज़िंदगी हिज्र के ख़ंजर पे टिका रक्खी है।

लोग करते हैं यहाँ लफ़्ज़-ओ-बयाँ की बातें,
हम ने ख़ामोशी में इक बात दबा रक्खी है।

रास आई न हमें शहर की महफ़िल शायद,
हम ने तन्हाई से इक शर्त लगा रक्खी है।

क़तरा-ए-अश्क जो पलकों से गिरा है कल शब,
उस में तूफ़ान की मानिंद सदा रक्खी है।

ज़ख़्म सीने के छुपाने का हुनर जानते हैं,
मुस्कुराहट भी लबों पर ही सजा रक्खी है।

कारवाँ बीत गया धूप के सहराओं से,
हम ने साए की तमन्ना ही मिटा रक्खी है।

बज़्म-ए-शायद में तिरा नाम चमकता है बहुत,
'बाबरा' तू ने ग़ज़ल ख़ूब बना रक्खी है।
 - सुशील कुमार 'बाबरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
14 घंटे पहले

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